Life Shayari | लाइफ शायरी

जुबां पे बात आयी है उसकी
मैं बोलूंगा तो रुसवाई है उसकी

ते तकल्लुफ ना फरमाइए
मेरी बाहो में आ जाइये
कल को शायद रहे ना रहे
ज़िन्दगी का भरोसा नहीं

वो शख्स भी आज मुझको बुरा जान रहा है
जिस शख्स पे बरसो मेरा एहसान रहा है
वो शख्स के फूलो से जिसको जख्म मिले हो
पतझड़ में भी फूलो का निगह बाँध रहा है

चाहे जख्म-ए-दिल रिसते हुए नासूर बन जाये
मगर कमजर्फ के हाथो से हम मरहम नहीं लेंगे
जिन्हे तू दोस्त कहता है उन्ही से तुझको बचना है
ये बदलेंगे तो बदला दुश्मनो से काम नहीं लेंगे

आसमां इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है कि जमीन से ही नज़र आता है
नाराजगी को नहीं छोड़ते खामोसी पर
बात कीजिये तो कोई हल भी निकल आता है
और तू ही चाहे तो रोक ले बढ़ कर मुझे
वरना मेरे जाने से तेरे शहर का क्या जाता है

बड़ी ही शान से रहते थे लोग जिसमे कभी
उसी मकान में आज मकड़ियों का जाला है
बोहोत गुरूर है तुझको अपनी दौलत पर
इसी गुरूर ने कितनो को मार डाला है

महलो में रहने वाली अमीरी तू एक दिन
सड़क पे चल के आ, मजबूर बन के देख
मेहनत के बाद भूख की शिद्दत है किसका नाम
ये जानना है तुझको तो मजदूर बन के देख

अगर चाहो कोई रिश्ता निभाना
गिला, शिकवा, शिकायत भूल जाना
ये सुन लो फिर मेरी दुनिया में आना
रास्ते में पड़ेगा ये जमाना
गलत है कौन ये तुम ही बताना
मगर सच्चाई से पर्दा उठाना
और हसीनो की सदा फितरत रही है
सतना, फिर सतना, फिर सतना

आप को मैंने निगाहो में बसा रखा है
आईना छोड़िये आईने में क्या रखा है
जिसके साये में हँसी वादे किये थे तूने
मैंने उस पेड़ की शाखो को हरा रखा है
जाने कब लौट के आ जाए बिछड़ने वाला
इसी उम्मीद में दरवाजा खुला रखा है
तेरी मोहब्बत के मरीज ने आखिरी सांस तक
तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखा है

दिमाग के लिए दिल की नज़र जरुरी है
कोई भी घर हो हवा का गुजर जरुरी है
अकेले ज़िन्दगी आवारगी सी लगती है
मोहब्बतों के लिए एक घर ज़रूरी है

खुद को औरो की तवज्जो का तमाशा ना करो
आइना देख लो एहबाब से पूछा ना करो
वो जिलायेंगे तुम्हे शर्त है इतनी
के तुम सिर्फ जीते रहो जीने की तमन्ना ना करो

इस नए दौर में तहजीब की पामाली है
घर में रहते हुए लगता है की घर खाली है
आसमानो से उतरने का इरादा है तो सुन
शाख पे एक परिंदे की जगह खाली है
और जिसकी आँखों में शरारत है वो मुहबूबा है
ये जो लाचार सी औरत है ये घरवाली है

तमाम रात सितारों से बात करते है
अकेले होके हज़ारो से बात करते है
यहाँ तो होंठ हिलाना भी जुर्म है शायद
तमाम लोग इशारो से बात करते है

तू बेवफा है फिर भी मेरे दिल के पास है
वो हौसला कहाँ कि तुझे पा के खो सकूँ
तेरी नजर तो कर गयी दुनिया से बेखबर
अब मेरी मजाल क्या कि मैं दीवाना हो सकूँ

मेरे महबूब मुझे शौक से कह लो
मैं तो पत्थर को भी भगवान कहा करता हूँ
बेरुखी होती है तो महबूब से पहले पहल
मैं उसे प्यार का उन्वान कहा करता हूँ

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